इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रकृति के मामले में समझौते के बाद भी आपराधिक मुकदमा चलाना समय तथा अदालत की शक्ति की बर्बादी है। न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ ही बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दायर याचिका मंजूर कर ली और मुरादाबाद में दर्ज 10 साल पुरानी आपराधिक केस कार्यवाही को रद कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि भले ही सीआरपीसी की धारा 320 के तहत मजिस्ट्रेट गैर सुलहनामा वाले अपराधों पर समझौता स्वीकार न करे, लेकिन हाई कोर्ट में इसे खत्म करने की अंतर्निहित शक्ति है। वसीम अहमद व अन्य ने अतिरिक्त सिविल जज ज्युडीशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी जिसमें राज्य बनाम रईस व अन्य केस समझौते के आधार पर खत्म करने इन्कार किया गया था।
प्रकरण थाना कांठ में दर्ज है। आरोप आइपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 472, 504, 506, 120-बी के थे। ट्रायल कोर्ट का कहना था कि आरोपित अपराध गैर सुलहनामा प्रकृति के हैं।
याचीगण की तरफ से रामगोपाल बनाम कर्नाटक (2022) कृष्णप्पा बनाम महाराष्ट्र, परबतभाई आहिर बनाम गुजरात (2017) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए दलील गई दी कि मजिस्ट्रेट की शक्ति धारा 320 सीआरपीसी तक सीमित है, लेकिन हाई कोर्ट बीएनएसएस की धारा 528 के तहत समझौते के आधार पर मुकदमा खत्म कर सकता है, चाहे अपराध गैर सुलहनामा ही क्यों न हो।
प्रतिवादी मोहम्मद आरिफ के वकील ने कोर्ट में स्वीकार किया कि समझौता हो चुका है और मुवक्किल केस रद करना चाहते हैं। पीठ ने 26 नवंबर 2025 के मजिस्ट्रेट के आदेश को गलत नहीं माना।
कहा, मजिस्ट्रेट धारा 320 सीआरपीसी से बंधा है लेकिन निखिल मर्चेंट (2008) और ज्ञान सिंह (2012) मामले के सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों को देखते हुए कहा कि जब पक्षों में सच्चा समझौता हो गया है और मामला सिविल प्रकृति का है तो मुकदमा चलाना समय व न्यायालय की शक्ति की बर्बादी होगी।
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